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Monday, 21 December 2015

हिज़्र का शायद उसे मलाल भी नहीं









वो रोकता भी नहीं, टोकता भी नहीं 
मैं तन्हा हूँ कभी सोचता भी नहीं 

हिज़्र का शायद उसे मलाल भी नहीं 
किस्मतों के लिखे को कोसता भी नहीं 

कहाँ जाएंं इस दिल को लेकर, जो तेरे 
दामन-ए-ख्याल को छोड़ता भी नहीं 

ऐसा भी आखिर क्या हुआ है जो 
तू मेरे यार मुझसे बोलता भी नहीं 
शायर: आकाश 
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Thursday, 17 December 2015

अपना तो राज़दाँ कोई नहीं









कहें जिससे दास्ताँ कोई नहीं
अपना तो राज़दाँ कोई नहीं 

ज़िंदगी ये कहाँ ले आई है 
एहबाब भी यहाँ कोई नहीं 

देख लिया भटककर हर जगह 
मिला राहत का समां कोई नहीं

अब तो दिल भी यही चाहे है 
रहें वहाँ हो जहाँ कोई नहीं 

इस दुनिया से निपटने दे अभी 
तुझे भी देख लेंगें आसमां कोई नहीं

शायर: "आकाश "





Monday, 2 November 2015

लोग ज़ाहिल ही अच्छे थे










तरकियों के इस दौर में 
तहज़ीब कहीं खो-सी गई है 
ना बुजुर्गों की अज़मत का ख़्याल रहा 
ना हया के पर्दों का सवाल रहा 
ना मोहब्बत का सलीका रहा 
रंग हर शै का आज के दौर के 
इंसान पे फ़ीका रहा 

चार लफ़्ज़ों का इल्म क्या हुआ 
के खुद को समझने लगे इल्मदां 
ना जाने ये कैसी हवा चली है के 
बच्चे नाम लेके पुकारने लगे हैं बुजुर्गों के 

देख के ये सब मंज़र 
दिल कहता है "आकाश"
के घर मिट्टी के ही अच्छे थे 
लोग ज़ाहिल ही अच्छे थे 
कम से कम तहज़ीब तो जिंदा थी 





शायर: "आकाश"





दिल अब जिन्दा नहीं हो रहा












दुनिया में क्या-क्या नहीं हो रहा 
इक बस वो ही मेरा नहीं हो रहा

वो ना मिला तो मर ही जाऊँगा
मैंने जो भी था सोचा नहीं हो रहा

आहिस्ता-आहिस्ता तमाम हो रहा है
दिल उससे लेकिन जुदा नहीं हो रहा

तग़ाफ़ुल बस इकरारे-इश्क़ से है अब
मैं तुमसे लेकिन बेवफा नहीं हो रहा

बारहा कर चुका हूँ कोशिशें "आकाश"
दिल लेकिन अब जिन्दा नहीं हो रहा





शायर: "आकाश"