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Thursday, 31 December 2015

सिगरेट पे सिगरेट पिते जा रहा हूँ










सिगरेट पे सिगरेट पिते जा रहा हूँ 
धुआँ- धुआँ मैं होते जा रहा हूँ 
शाखे-उल्फ़त से टूटा हुआ गुल हूँ मैं 
रफ़्ता -रफ़्ता यारों मुरझाते जा रहा हूँ





शायर: "आकाश"


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Monday, 21 December 2015

हिज़्र का शायद उसे मलाल भी नहीं









वो रोकता भी नहीं, टोकता भी नहीं 
मैं तन्हा हूँ कभी सोचता भी नहीं 

हिज़्र का शायद उसे मलाल भी नहीं 
किस्मतों के लिखे को कोसता भी नहीं 

कहाँ जाएंं इस दिल को लेकर, जो तेरे 
दामन-ए-ख्याल को छोड़ता भी नहीं 

ऐसा भी आखिर क्या हुआ है जो 
तू मेरे यार मुझसे बोलता भी नहीं 
शायर: आकाश 
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Thursday, 17 December 2015

अपना तो राज़दाँ कोई नहीं









कहें जिससे दास्ताँ कोई नहीं
अपना तो राज़दाँ कोई नहीं 

ज़िंदगी ये कहाँ ले आई है 
एहबाब भी यहाँ कोई नहीं 

देख लिया भटककर हर जगह 
मिला राहत का समां कोई नहीं

अब तो दिल भी यही चाहे है 
रहें वहाँ हो जहाँ कोई नहीं 

इस दुनिया से निपटने दे अभी 
तुझे भी देख लेंगें आसमां कोई नहीं

शायर: "आकाश "





Friday, 27 November 2015

जिन आँखों में तू रहता हो










ज़िंदगी फिर उम्र भर है रोती 
अपने मन की जब नहीं होती 

जिन आँखों में तू रहता हो 
वो आँखें हैं कब सोतीं 

आँखों की सिप्पियों में जो रखे थे 
ग़ज़लों में पिरो दिए हैं सब मोती 

दिल-ए-आशिक़ की भी तो पूछ कभी 
क्यों कभी इसकी बात नहीं होती 

क्यों बचपन ही अच्छा था ना 
जवाँ हुए तो तुम गई दूर होती





शायर: "आकाश"

Monday, 2 November 2015

लोग ज़ाहिल ही अच्छे थे










तरकियों के इस दौर में 
तहज़ीब कहीं खो-सी गई है 
ना बुजुर्गों की अज़मत का ख़्याल रहा 
ना हया के पर्दों का सवाल रहा 
ना मोहब्बत का सलीका रहा 
रंग हर शै का आज के दौर के 
इंसान पे फ़ीका रहा 

चार लफ़्ज़ों का इल्म क्या हुआ 
के खुद को समझने लगे इल्मदां 
ना जाने ये कैसी हवा चली है के 
बच्चे नाम लेके पुकारने लगे हैं बुजुर्गों के 

देख के ये सब मंज़र 
दिल कहता है "आकाश"
के घर मिट्टी के ही अच्छे थे 
लोग ज़ाहिल ही अच्छे थे 
कम से कम तहज़ीब तो जिंदा थी 





शायर: "आकाश"





दिल अब जिन्दा नहीं हो रहा












दुनिया में क्या-क्या नहीं हो रहा 
इक बस वो ही मेरा नहीं हो रहा

वो ना मिला तो मर ही जाऊँगा
मैंने जो भी था सोचा नहीं हो रहा

आहिस्ता-आहिस्ता तमाम हो रहा है
दिल उससे लेकिन जुदा नहीं हो रहा

तग़ाफ़ुल बस इकरारे-इश्क़ से है अब
मैं तुमसे लेकिन बेवफा नहीं हो रहा

बारहा कर चुका हूँ कोशिशें "आकाश"
दिल लेकिन अब जिन्दा नहीं हो रहा





शायर: "आकाश"





Thursday, 29 October 2015

इन काले गहरे अंधेरों में, मैं तुम्हें ढूंढा करता हूँ











हर कोई दिल में वो मुक़ाम नहीं पाया करता 
हर किसी को आने की मन इजाज़त नहीं दिया करता 
मैं भी चाहता तो हूँ किसी का अब होना लेकिन 
मुझे तुझ-सा और कहीं, कोई नहीं मिला करता 

मेरे पास तो ऐसा भी कोई अहबाब नहीं,
 जिससे कर सकूँ तेरी बात मैं 
ग़म फ़िराक़ का सताए तो, 
काट सकूँ वो शब किसी का पकड़ के हाथ मैं 

मेरी तो दास्ताँ ही इतनी,
के तुमसे मोहब्बत करता था, करता हूँ 
ख़्वाब वही तुम्हारे साथ जीने के,
मैं बुनता था, बुनता हूँ 

इन काले गहरे अंधेरों में, मैं तुम्हें ढूंढा करता हूँ 
इक बार तुमसे मिलने को, मैं बेतहाशा तड़फा करता हूँ 
,मैं आज भी नाम तुम्हारे ही, सब गीत लिखा करता हूँ 
सब गीतों में तुम्हें अपना, मैं मीत लिखा करता हूँ 





शायर: "आकाश"

Wednesday, 28 October 2015

अब ये पथ छोड़ना आसान नहीं







डूब चुका अब तो मन प्रेम में 
अब ये पथ छोड़ना आसान नहीं । 

                                              अब तो चाहे-

 जियूँ या मरुँ,
मुरझाऊँ या खिलूँ ,
जीतूँ या हारूँ,

                                               दिलों के इस खेल में ।  
                                                अब ये पथ छोड़ना आसान नहीं ।।

जीवन चाहे कितना भी है
तुम बिन अधूरा तो है
वक्त जो कहीं नहीं ठहरता 
मेरे दिल में ठहरा तो है 
हिस्से में चाहतों का समंदर ना सही 
यादों का सहरा तो है 
हासिल चाहे कुछ  भी ना हुआ हो  
एहसास लेकिन गहरा तो है ॥ 

                                             प्रेम की एक बूंद ही - 

काफ़ी  होती है जीने के लिए,
हर घाव को भरने के लिए,
दिलों के खिलने के लिए, 

                                             दुखों की तपती रेत में 
                                             अब ये पथ छोड़ना आसान नहीं ।।
                                             चाहे कितना भी कहूँ संक्षेप में 
                                              अब ये पथ छोड़ना आसान नहीं ।।





शायर: "आकाश"





Tuesday, 27 October 2015

मोहब्बत एक पहेली है








मोहब्बत एक पहेली है,
चलती अकेली है। 

कहीं पल भर न ठहरे,
कहीं से उम्र भर न निकले,
बड़ी अलबेली है। 

किसी के लिए ये उजाड़ बस्ती,
किसी के लिए ये हवेली है। 

बर्बाद दिलों को आबाद कर दे,
आबाद दिलों को बर्बाद कर दे,
इसके रंग वही जाने
जिसके साथ ये खेली है। 

मोहब्बत एक पहेली है,
चलती अकेली है। 




शायर: "आकाश"







Monday, 26 October 2015

वो हुआ दिल का हिस्सा है








निकाल कर वही गलत-सलत अर्थ ही कहेंगे 
लोगों का क्या है जो भी कहेंगे व्यर्थ ही कहेंगे 

बस इतना सा किस्सा है 
वो हुआ दिल का  हिस्सा है 

वो कोई हयात नहीं 
जिस में तेरा साथ नहीं 

उसके पाँव के लम्से-अव्वल को तरसे दर मेरा 
वो कभी आए तो हो जाए मुहतरम  घर मेरा 

अपने घर में भी करार नहीं मिलता 
जब मनचाहा प्यार नहीं मिलता 

शायर: "आकाश"